समय रहते करे बाढ़ प्रबंधन!

मानव सभ्यता के उदभव काल से ही मनुष्यों का नदियों से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है।  प्रारंभिक काल में सारी सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुईं तथा उनका विस्तार हुआ।  किसी भी प्रदेश  का विकास बड़े पैमाने पर उस प्रदेश में उपलब्ध  प्राकृतिक संसाधनों और उपयोग के तरीकों पर निर्भर करता है ।  अत्यधिक दोहन एवं  संसाधनों के कुप्रबंधन से पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव उत्पन्न  होने लगते  हैं ।औद्योगिक क्रांति, शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि के कारण पर्यावरण पर दबाव  बढ़  रहा  है। इसके कारण  भूमि उपयोग  में भी बदलाव आया है।  वर्तमान में असम, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, राजस्थान, बिहार  समेत देश के कई हिस्सों में लाखों लोग बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हो गए हैं। बाढ़ की विभीषिका केवल जन-धन  को हानि  नहीं पहुंचाती है , बल्कि यह अपने साथ लाखों-करोड़ों  सपनों  को भी बहा ले जाती है।  यदि आपदा प्रबंधन  को सुनियोजित तरीके से लागु किया जाये तो आपदा बचाव और राहत पर कम समय तथा धन खर्च करना पड़ेगा। साथ ही जन-धन की अपार  क्षति को भी कम  किया जा सकता है ।  
सुदूर संवेदन  (रिमोट सेंसिंग ) तकनीक भूमि उपयोग में आ रहे बदलाव का आकलन करने के लिए  एक कारगर तरीका है । इस तकनीक के अंतर्गत  उपग्रह द्वारा भेजे गए छवियों का अध्ययन किया जाता है। इस तकनीक का इस्तेमाल करके  यह पता लगाया जा सकता है की किसी निश्चित वर्ष की तुलना में भूमि उपयोग में कितना बदलाव आया है । साथ ही इस तकनीक के द्वारा डिजिटल उन्नयन मानचित्र तैयार करके बाढ़ की स्थिति  के अनुसार नदियों के स्वरुप और विस्तार का भी अनुमान लगाया जा सकता है।  उदाहरण के लिए , इसी तकनीक का इस्तेमाल करके  इंटरनेशनल  जर्नल ऑफ़ रिमोट सेंसिंग में छपे एक  लेख में हमने दिल्ली से बहने वाली यमुना नदी के पात्र  का अध्ययन किया है।  वर्ष 1901 में दिल्ली एक छोटा सा शहर था, जिसकी  कुल आबादी केवल ४ लाख थी। जनगणना २०११  के विवरण पे अगर गौर करें तो  दिल्ली की कुल आबादी  १.६८   करोड़  हो गई है।  जाहिर है, तेजी से बढ़ती जनसंख्या का दिल्ली  के पर्यावरण पर भी  प्रभाव पड़ा होगा ।विश्लेषण से पता चला  कि वर्ष २००९ की तुलना में वर्ष १९७७ में नदी ताल में पानी की उलब्धता अधिक थी।  इसी  अवधि  के दौरान नदी पात्र (चैनल)  के क्षेत्रफल में  ५. ३ % की कमी हुई है।  दिल्ली के यमुना नदी पात्र  में  घने वनस्पति  का क्षेत्रफल भी  २३.१ % से घटकर १५.८ % हो गया  है। साथ ही  यमुना नदी पात्र में निर्माण क्षेत्र ७ % से बढ़ गया है।  नदी पात्र में निर्माण कार्य बढ़ने के मुख्य कारण भूमि की उपलब्धता में  कमी, शहरीकरण के प्रभाव  और मानव-कृत  अतिक्रमण  हो सकते हैं ।  यह दर्शाता है कि आज के समय  में यदि  यमुना का प्रवाह अपने पात्र तक भी सिमित रहे तो कई घर जलमग्न हो जायेंगे और इसे बाढ़ की संज्ञा दे दी जाएगी। 
नदियों के किनारे बसे शहरों के  विस्तार एवं विकास के अनुरूप जल  निकासी के लिए   पर्याप्त व्यवस्था भी नहीं की गई  है।  शहर के बढ़ते आकार  के साथ ही  अनधिकृत  बस्तियों  की संख्या तथा क्षेत्र भी बढ़ रहा  है।  अधिकांश अनधिकृत बस्तियाँ शहरों के  निचले इलाकों में बसी होती है।  नदियों में जल बढ़ने की अवस्था में  सर्वाधिक हानि निचले इलाकों में बसे  बस्तियों में रहने वाले लोगों को उठानी पड़ती है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का स्वरुप भी बदल रहा है।  वैज्ञानिकों का अनुमान है की आने वाले समय में वर्षा की तीव्रता बढ़ जाएगी।  अर्थात बहुत काम समय में ही अधिक बारिश रिकॉर्ड  होगी और   हम अब ऐसा महसूस भी कर रहे हैं। इसलिए यह नितांत आवश्यक है की नगर प्रबंधन,  जलजमाव और बाढ़ के इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करे । नदियों के किनारे बसे गाँव में स्थिति तो और भी भयावह होती है। १८ अगस्त २००८  में  कोसी  नदी से आये बाढ़ की विभिषिका को याद करके आज भी दिल दहल जाता है।  वर्ष २००८ के कोसी आपदा ने हमें सबक दिया है कि हमें अपने आपदा प्रबंधन  को चुस्त-दुरुस्त करने की  कितनी आवश्यकता   है।   पटना उच्च न्यायालय पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजेश बलिया के नेतृत्व में बने कोसी न्यायिक जांच आयोग ने अपने रिपोर्ट में कई प्रशासनिक लापरवाही का उल्लेख किया है। यदि समय रहते कार्रवाई प्रारंभ हो गई होती तो शायद बाढ़ का स्वरूप इतना विकराल न हुआ होता।
आज की यह जररूरत है की बाढ़  से बचाव के लिये प्रतिरोधात्मक उपाय  पर ज्यादा ध्यान  दिया जाये । जबकि होता यह आया है  कि बाढ़ आने पर बचाव एवं राहत कार्यों पर अधिक ध्यान दिया गया है।  सुदूर संवेदन और भूसूचना तकनीक का इस्तेमाल करके जल जमाव और बाढ़ के विभीषिका अनुमान लगाया जाये। इससे समय रहते तटबंधों को आवश्यकतानुसार मरम्मत किया जा सकेगा और शहरों में जलनिकासी की आधारभूत संरचना को सुधारने में भी मदद मिलेगी। इन उपायों से बाढ़ से पूर्ण मुक्ति तो नहीं मिलेगी किन्तु इससे होने वाली लोगों को परेशानी में काफी कमी आएगी। 

कैरियर क्या है?

“कैरियर क्या है? ‘ इस सवाल से सभी  लोगों को गुजरना पडता होगा। मैं भी इससे गुजर चुकी हूं । शब्दकोश के अनुसार कैरियर  एक पेशा या व्यवसाय है जो कि कमाई एक जरिया  है। तो फिर कुछ लोग   ‘कैरियर’ बनाते हैं  और   कुछ लोग  सिर्फ ‘नौकरी’ तक ही क्यों सिमित रह जाते हैं ? इन दोनों में  अर्थ के दॄष्टिकोण से क्या अंतर है?  अगर हम ये मान लें की इन दोनों में कोई अंतर नहीं है  तो फिर यह क्यों कहा जाता है  कि लता मंगेशकर, सचिन तेंदुलकर, माधुरी दीक्षित , कल्पना चावला, विश्वनाथन आनंद  और इनके  जैसे  कई व्यक्तियों ने ‘कैरियर’ बनाया ? शायद इसका कारण  यह है  कि  इन  लोगों ने जो  अपने क्षेत्र में  हासिल किया, उसकी वजह से वे सम्बंधित क्षेत्र में आदर्श बन गए । इन्होंने जो रास्ता चुना वो आसान कदापि नहीं था और सफलता की सम्भवनाएँ भी सिमित थीं किन्तु इन्होने अपने दृढ़ संकल्प और मेहनत के बदौलत अपने क्षेत्र में उच्च मुकाम को हासिल किया।  इन सब में एक खासियत  यह है की इन्होंने अपने जीवन में उस रास्ते  को चुना जो इनके व्यक्तिगत इच्छा और क्षमता के अनुरूप था। 
यह आवश्यक  है की हम   कैरियर के  व्यवहारिक  अर्थ को समझें  । आम धारणा है कि किसी एक क्षेत्र में शिक्षा पूरी होने के बाद कम से कम पाँच  आंकड़े की  तनख्वा वाली नौकरी मिल जाये , उसमे बढ़ोतरी मिलती रहे  और थोड़ा सा  अनुभव पा कर हम विदेश जा कर बस जाये। ये हमने या हम में से आम जनो द्वारा बनाये हुए प्रगति पथ के  मील का  पत्थर बन चुका  है । लेकिन मेरा सवाल यह है कि इसमें कैरियर कहाँ है? इस ढर्रे से हम कब बाहर निकलेंगे? 
अधिकांश माता पिता अपने बच्चों को किसी एक खास विषय का चयन करने के लिए बाध्य करते हैं। क्यों? क्योंकि  वह  अंतरराष्ट्रीय स्तर  पर एक महत्वपूर्ण विषय है।  लेकिन माता पिता को यह देखना भी जरुरी  है की क्या आपके  बच्चे को उस विषय में रूचि हैं ? उस विषय में अनुत्तीर्ण होकर अथवा कम अंक पा कर बच्चे  क्या हासिल कर पाएंगे ? इससे बेहतर है की  बच्चों को उनके  पसंदीदा विषय में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाये । अगर वो उसमे अव्वल हों तो  उनका  एक अच्छा कैरियर बन सकेगा। 
चिकित्सा और अभियांत्रिकी इन दो शाखाओं को  अभी भी प्रमुख माना जाता है। इसके आगे भी बहुत कुछ अलग और अच्छा है यह समझने की जरुरत है। एक बंधे हुए ढ़र्रे पे चलने में लोगों को कम जोखिम महसूस होती है  । यही कारन है की  लोग नए रास्तों का चुनाव करने में  हिचकिचाते है। जिंदगी  में हम  कितनी जोख़िमों से बचेंगे?  इसका कितना हौव्वा बनाएँगे ? जिन्दगी में  बिना जोखिम के कुछ हासिल नहीं होता  है। चुनौती के रूप में यह जोखिम उठाओ ।  चाहे नुकसान भी हो पर ग्यान तो पाएंगे ! लड़खड़ाओ, गिरो, फिर उठो और तब तक कोशिश जारी रखो जब तक आप सफल न बन जाओ। बचपन में  भी हम लड़खड़ाते हुए ही चलना सीखे हैं, तो फिर अब यह संघर्ष का दामन कैसे छोड़ सकते है? तब खतरे से अवगत नहीं थे, चोट से रूबरू नहीं थे और आज हैं , इसलिए? खतरों से डरो मत। इन्हे अपना दोस्त बना लो। यही आपका सामर्थ्य बढ़ाएंगे, आत्मविश्वास बढ़ाएंगे और आपको  अपने लक्ष्य में कामयाब बनाएंगे। 
कुछ लोग यह भी पूछेंगे की क्या सिर्फ जोखिम  उठाने से हम कामयाब बन जायेंगे? तो, नहीं! अपनी चुनी हुई  चुनौती का सब से पहले अनुमान लगाए, अपने जोखिम उठाने की क्षमता को भाँप ले और प्राथमिकता के अनुसार अपनी राह पर चल पड़े।  निश्चित रूप से  आपकी नौकरी तब कैरियर में तब्दील  हो जाएगी ।  तब वह सिर्फ एक कमाई का जरिया न रहकर  जीवन जीने की राह बन जाएगी ।  क्यों सब अब्दुल कलम नहीं बन पाते, क्यों कहीं किसी एक हो ही नोबेल पुरस्कार प्राप्त होता है, क्यों सिर्फ अमीर  लोगों की ही सूची बनायीं जाती है…. इन सब सवालों के जवाब कहीं इसी में  तो  नहीं छुपे है ?

घटस्फोट

आजकाल टीव्ही वर ‘त्रिवार तलाक’ या विषयावर चर्चेचे पेव फुटलेले दिसतेय. या निमित्ताने मी विचार केला कि इंग्रजीमध्ये याला डिवोर्स म्हणतात, उर्दू मध्ये तलाक मग हिंदीमध्ये किंवा संस्कृतमध्ये याला काहीच का शब्द नाही? बरे मराठीत म्हणतात घटस्फोट, पण तोही फक्त एक सूचक शब्द वाटतो समर्पक नाही. म्हणजे आपल्या सनातन धर्मात विवाह बंधनातून मुक्ती नाहीच मुळी.

मराठीमध्ये विवाहबंधनातून मुक्त होण्यास  ‘घटस्फोट’ असे संबोधले जाते . पण या शब्दाचा जर खरा अर्थ आपण समजावून घेतला तर आपल्याला समजेल कि आपली संस्कृती किती गहन विचारांनी बनलेली आहे. तर, घटस्फोट कशाला म्हणतात?  प्रेतावर होणारा हा अंतिम संस्कार! यामध्ये संस्कार करणारा असतो तो आपल्या डाव्या खांद्यावर पाण्याने भरलेला माठ घेवुन प्रेताला अपसव्य म्हणजे डावि प्रदक्षिणा घालतो , यावेळेस एका दगडाने खांद्यावरिल मडक्याला एक छिद्र पाडतात , अशा तीन प्रदक्षिणा करुन प्रेताच्या मस्तकाजवळ उभे राहून ज्या दगडाने माठाला छिद्र  पाडले गेले तो दगड खांद्यावर माठ असणाऱ्याच्या मागे ठेवतात मग त्या दगडावर खांद्यावरील माठ मागे सोडून देतात तेव्वा त्या माठाचा फ sss ट्ट  असा आवाज होवुन तो फुटतो यालाच घटस्फोट असे म्हणतात. ( आता नवरा किवा बायको हयात असतानाच घटस्फोट घेतला जातो तो भाग वेगळा!) म्हणजेच आपल्या सनातन धर्मामध्ये लग्न करून एकत्र आलेल्या जोडप्याला विलग होण्यास मृत्यूव्यतिरिक्त तरी दुसरी कुठलीही सोय नाही. किंवा याचा दुसरा अर्थ असाही होऊ शकतो कि लग्नबंधनातून वेगळे झाल्यानंतर तुम्ही निव्वळ एक प्रेत बनून राहता.

मुळात प्रश्न हा येतो कि समाजानी बनवलेली हि लग्नसंस्था इतकी सदोष आहे का कि तिच्यामध्ये समाविष्ट होऊन राहणे कठीण व्हावे? सनातन धर्मामध्ये विवाह हा कायदा, करार नसून ईश्वराने निर्माण केलेला संस्कार आहे, असे आपण मानतो. मग ईश्वराने निर्माण केलेल्या या संस्कारावर आपण संशय का घ्यावा? उलटपक्षी त्या संस्काराला सर्वतोपरी टिकवणे हे आपले धर्म कर्तव्य आहे असे समजले पाहिजे.

अर्थात, आजकाल घटस्फोटांचे वाढते प्रमाण पाहता मन निश्चितच विचारमग्न होते कि नेमके काय आणि कुठे चुकतेय? पूर्वीच्या काळी काहीही झाले तरी (म्हणजे घरगुती हिंसेला मी अनुमोदन देतेय असे नव्हे!) विवाह टिकवणे याकडे कल  असायचा परंतु आजकाल आपली सर्वांचीच जुळवून घेण्याची क्षमता कमी झालीय. पाश्चात्य संस्कृतीचा प्रभाव वाढत चाललाय. आपल्या भारतीय संस्कृतीत पती-पत्नी एकमेकांसमवेत ७ जन्म रहाण्याचा विचार करतात आणि आम्हाला मृत्यूच एकमेकांपासून दूर करील या विचारसरणीचे ते असतात, तर पाश्चात्त्य संस्कृतीमध्ये जोपर्यंत पती-पत्नी एकमेकांना सुख देऊ शकतात, तोपर्यंतच ते एकत्र रहातात. पाश्चात्त्यांच्या या विचारसरणीमुळे विदेशात ६० टक्के विवाहितांचे घटस्फोट होतात असे कुठल्याशा लेखात वाचनात आले. लग्न हे निव्वळ सुख मिळवण्यासाठी केले जाते का? आणि हे सुख म्हणजे नेमके काय? सुखाच्या आपापल्या संकल्पना दुसऱ्यावर बोजा तर होत नाहीयेत ना हे नको का  विचारात घ्यायला? सुखप्राप्तीच्या अपेक्षा या वाजवी आहेत कि अवाजवी यावर विचार नको का करायला? जसे रोपटे नव्या ठिकाणी रुजायला वेळ लागतो तसेच नातेही रुजायला, फुलायला वेळ लागतो तो नको का आपण द्यायला?

घटस्फोटाची अनेक कारणे असू शकतात. कदाचित, आपापल्या परीने योग्यही! पण त्यांची योग्यता वेगळे होण्याआधी निश्चितच पुन्हा तपासून पाहणे योग्य नाही का? प्रत्येक विवाहात अडचणी, अडथळे  असतातच आणि पती – पत्‍नी या अडचणी दूर करण्यासाठी प्रयत्नशील राहिले तर त्याइतका दुसरा आनंद कुठलाच नसतो.

Common Curtsey

Annoyed with people who lack etiquette….Manners and common sense are at an all-time low. Holy crap, people! What is with you? If you can’t have both, at least try to implement one or the other. 

Few obnoxious habits: 

1. Dropping midnight messages, calls before the receiver might have not even woke up! Common guys, all are not insomniacs. Normal people need peaceful sleep min of 6 hrs (in my case it is min 8 hrs…. So don’t disturb me between 10pm to 7am! )
2. Galling impatience! Some people just can’t wait when the receiver is busy with other call…continuous beep beep beep….(Call waiting service is active on my cell, wait till i’m done. I’ll call u back!)
3. Intrude into someone’s life! If you’re that good your existence will be noticed, no need to prove it all the time. Don’t try to gain unnecessary importance! ( I hate guys those try to make me understand that I love them and I’m not getting it!!! HA HA HA…. It’s a pity!)
4. Nose poking! I wonder how people get such leisure time! And the free advise service is just awesome!!! Works 24×7 irrespective of the demand. ( Keep the so called free advise with you only, you may need it for yourself…someday!)
5. Immaturely premature commenting! How’bout a guy giving “expert” comments on a girl for the tiny hair on her hand??? Dude, she’s more experienced than you, she knows when to get it done. She cares herself more than damn anybody. ( U never know, in the next meeting she’ll come along with the wax strips and clean your ‘Jungle’!!! I just recalled a proverb in marathi though not so perfectly suitable… ‘Apan hase lokala, Shumbud aplya nakala!;P )
The list is too long & i’m running short of time. Have just given food for thought…. If you’re not one of them, just enjoy!!! 🙂

लाट

मूक मनस्थितीत विचारांच्या लाटा

जेव्हा येऊन आदळतात

हृदयाच्या किनार्यावर

आणि रेती ओरबाडून …. तशाच परततातही…

दूरवर पसरलेली

खोल खोल ओंल सोडून….

आणि तो सपाट ओलावा….

सर्व काही सांगून जातो

लाट आल्याची चिन्हे बोलून जातो…

बंध

रोजच्याप्रमाणे आजही माझ्या ठरलेल्या बाकावर बसून मी बागेत येणाऱ्या जाणाऱ्या लोकांचे चेहरे न्याहाळत होते. कुणी आपापल्या मित्र-मैत्रिणीसोबत निवांत ठिकाणी मन रमवायला आले होते, कुणी आपल्या मुलाबाळांना खेळवायला आले होते तर कुठे वयस्क मंडळींचा मित्र परिवार जमलेला होता. बागेत नेहमीप्रमाणेच फुगेवाले, भेळ- पाणीपुरीवाले, फुलवाले आपापल्या जागी उभे होते. सगळे सगळे कसे नेहमीसारखेच होते पण नेहमी माझ्या बाकावर शेजारी येऊन बसणारा ‘तो’ मात्र आज कुठे दिसत नव्हता. इतक्या लोकांमध्ये त्यालाच न्याहाळणे मला आवडायचे. माझ्या मनात ना- ना प्रश्न येत होते. का बरे तो आला नसेल आज, त्याला बरे नसेल का, काही कामात व्यस्त असेल कि त्याला काही झाले असेल? त्याचा विचार करता करता जुन्या आठवणी मनाच्या पटलावर तरंगायला लागल्या.

बरयाच वर्षांपासून मी रोज त्याला इथे आलेले पाहत होते. त्याला पाहून असे वाटायचे कि कुठलीशी अपराधीपणाची भावना याच्या मनाला सलतेय. खांद्यांवर खूप मोठे ओझे आहे त्याच्या दु:खाचे. तो हसला तरी ती अपराधीपणाची झाक तो लपवू शकत नसे. कदाचित त्याच्या वैयक्तिक जीवनातल्या भूतकाळाशी याचा काही संबंध असावा! कोणती तरी खूप मोठी चूक, जिचा पश्चाताप तो इतकी वर्षे करतोय. माझ्याच विचारांच्या तंद्रीत मी वाहत चालले होते अन तितक्यात दूरवर मला तो येताना दिसला.

अरेच्चा, आज स्वारी भलतीच खुशीत दिसतेय. याआधी कधीच हे हसू ओठांवर चमकले नव्हते. आज नक्कीच खूप मोठी आनंदाची गोष्ट घडलेली असणार हे त्याच्या चालण्यावरूनच कळत होते. आता हा माझा केवळ भ्रम कि त्याच्या ‘नाईके’ बुटांची जादू होती हे तोच जाणे!  आणि हो, त्याच्या हातात एक सुंदर फुगा पण होता. आज काय आहे बुआ, मला तर काहीच कळत नव्हते. आज ‘प्रेम दिन’ कि काय म्हणतात तो हि नव्हता. मग हा फुगा….. आणि तोही इतक्या प्रौढ व्यक्तीच्या हातात? मी गोंधळून गेले होते…… कदाचित हा फुगा, हा चेहऱ्यावरून ओसंडून वाहणारा आनंद ‘ती’च्याशी संबंधित तर नसेल? माझ्या मनात उगीच एक शंकेची पाल चुकचुकली… पण इतकी वर्षे ती त्याला भेटली नव्हती मग आज अचानक….???….

त्या दिवशी पहिल्यांदाच मी या बागेत आले होते. त्या दोघांमध्ये काय संवाद झाला मला कल्पना नाही. पण नक्कीच त्याच्या कुठल्याशा गोष्टीने, वाक्याने ती खूप खूप दुखावली गेली होती. तिचे डोळे पाण्याने डबडबले होते… दुख्खातीवेगाने तिने रस्त्यावर धाव घेतली आणि….. दैव बलवत्तर म्हणून केवळ ती वाचली. काळ आला होता पण वेळ अजून आली नव्हती.  ती वाचली पण…. तिच्यातला तो नवा अंकुर नाही तगला….तोच प्रेमाचा अंकुर जो त्याला नको होता. ती घटना घडून गेल्यावर मी इथे आले होते. लोक अशा गोष्टी कधीच विसरू शकत नाहीत म्हणतात हेच खरे!

लोक तिला उचलून दवाखान्यात घेऊन गेले. तोही होता तिच्यासोबत….. पण आता वेळ निघून गेली होती. त्यानंतर ती कधीच त्याच्याशी बोलली नाही आणि ही अपराधीपणाची भावनाही त्याच्या मनातून कधी जाऊ शकली नाही. हा सल उरी बाळगूनच तो इतके दिवस जगत होता… कदाचित एक ना एक दिवस ती त्याला माफ करेल या आशेवरच!

आज तो त्याच ठिकाणी थांबलाय जिथे ती जवळपास मृत्युच्या दाढेतच पोचली होती, जिथे त्यांच्या प्रेमाचा अंकुर रुजण्याआगोदरच उखडला गेला होता. तो कुणाची तरी वाट पाहत होता…. आणि ती आली…. होय, तीच ती…. तिच्या एका पुसटश्या स्मितहस्यानीही तो किती हरखून गेला होता…. असे वाटत होते जशी कुकरची शिट्टी उडाली असावी वाफ बाहेर टाकायला….. ते पाहून माझ्याही डोळ्यात हळूच पाणी तरळून गेले. तिच्या हातात एक पत्र होते. मला वाटले ते नक्कीच त्याच्यासाठी असणार! पण हे काय…. त्याने तर ते पत्र त्या फुग्याला बांधले… आणि दोघांनी मिळून तो फुगा आकाशात सोडून दिला. आता ते हातात हात घालून त्या फुग्याकडे बघत होते… प्रेमार्द्र नजरेने! त्या फुग्यासोबत जणू  त्यांची दुख्खे, तो अपराधीपणा, ती तेढ, सगळे काही दूर दूर चालले होते…. त्यांना पुन्हा एकदा जवळ आणण्यासाठीच जसे काही!

त्या पात्रानी सगळे काही उघड केले होते. तो फुगा माझ्यासाठीच होता तर! तिनी त्याला माफ केले होते…. मीही… खरेतर मी त्याला खूप आधीच माफ केले होते… जेव्हा मी पहिल्यांदा इथे आले होते. आज मी त्यांना शेवटचा निरोप देत होते…. साश्रू नयनांनी! मलाही आज खूप हलके वाटत आहे. जाता जाता त्यांना वळून पाहण्याचा मोह मी आवरू शकत नाहीये… माझ्या आई बाबांना, शेवटचेच ….. आणि आता नक्कीच ते मला जोडीदार म्हणून एकमेकांना अनुरूप वाटत आहेत.

अपमानाचा अपमान

अपमानाने एकदा सांगितली  त्याची कथा

हळहळले मन माझे समजून त्याची व्यथा

प्रश्न पडे त्याला, नाव का माझे ‘अपमान’?

नाही त्याला आदर, नसे काही मान

रिता झाला जेव्हा पुसले त्यास प्रेमाने

म्हणे सखे पुसती लोचने डबडबली जी पाण्याने

वेदना येती निकट, दुख्खास मी कारण

सांगा माजले त्वरेने जर असेल काही तारण,

नकोसा मी सर्वाना, मलाही नको मी

पदवी द्या मजला, सुखावेल सर्वाना जी,

नको मजला हे नाव, माझाही होई अपमान

जन्म गेला सोसण्यात, आता मलाही हवा सन्मान!